google-site-verification=NjzZlC7Fcg_KTCBLvYTlWhHm_miKusof8uIwdUbvX_U पौराणिक कथा

Thursday, September 13, 2018

श्री गणेश जी के 8 अवतारों की कहानी

श्री गणेश जी के 8 अवतारों की कहानी



 भगवान शिव और विष्णु जी की ही तरह श्री गणेश ने भी असुरों के नाश और धर्म की रक्षा के लिए कई बार अवतार लिया था। पुराणों के अनुसार हर युग में असुरी शक्ति को खत्म करने के लिए उन्होंने विकट, महोदर, विघ्नेश्वर जैसे आठ अलग-अलग नामों के अवतार लिए हैं। ये आठ अवतार मनुष्य के आठ तरह के दोष दूर करते हैं। इन आठ दोषों का नाम काम, क्रोध, मद, लोभ, ईर्ष्या, मोह, अहंकार और अज्ञान है। आइये जानते हैं श्री गणेश ने कब कौनसा अवतार लिया।

1. वक्रतुंड | Vakratunda |-
श्रीगणेश ने इस रुप में राक्षस मत्सरासुर के पुत्रों को मारा था। ये राक्षस शिव भक्त था और उसने शिवजी की तपस्या करके वरदान पा लिया था कि उसे किसी से भय नहीं रहेगा। मत्सरासुर ने देवगुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र भी थे सुंदरप्रिय और विषयप्रिय, ये दोनों भी बहुत अत्याचारी थे। सारे देवता शिव की शरण में पहुंच गए। शिव ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे गणेश का आह्वान करें, गणपति वक्रतुंड अवतार लेकर आएंगे। देवताओं ने आराधना की और गणपति ने वक्रतुंड के रुप में मत्सरासुर के दोनों पुत्रों का संहार किया और मत्सरासुर को भी पराजित कर दिया। वही मत्सरासुर बाद में गणपति का भक्त हो गया।
2. एकदंत | Ekadanta |-
महर्षि च्यवन ने अपने तपोबल से मद नाम के राक्षस की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से दीक्षा ली। शुक्राचार्य ने उसे हर तरह की विद्या में निपुण बनाया। शिक्षा होने पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया। सारे देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। सारे देवताओं ने मिलकर गणपति की आराधना की। तब भगवान गणेश एकदंत रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं, एक दांत, बड़ा पेट और उनका सिर हाथी के समान था। उनके हाथ में पाश, परशु, अंकुश और एक खिला हुआ कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।

महोदर | Mahodar|-
जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं के खिलाफ खड़ा किया। मोहासुर से मुक्ति के लिए देवताओं ने गणेश की उपासना की। तब गणेश ने महोदर अवतार लिया। महोदर यानी बड़े पेट वाले। वे मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में पहुंचे तो मोहासुर ने बिना युद्ध किये ही गणपति को अपना इष्ट बना लिया।
4. विकट | Vikata | –
भगवान विष्णु ने जलंधर नाम के राक्षस के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। उससे एक दैत्य उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कामासुर। कामासुर ने शिव की आराधना करके त्रिलोक विजय का वरदान पा लिया। इसके बाद उसने अन्य दैत्यों की तरह ही देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। तब सारे देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया। तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट रूप में भगवान मोर पर विराजित होकर अवतरित हुए। उन्होंने देवताओं को अभय वरदान देकर कामासुर को पराजित किया।
5. गजानन | Gajanan | –
धनराज कुबेर से लोभासुर का जन्म हुआ। वह शुक्राचार्य की शरण में गया और उसने शुक्राचार्य के आदेश पर शिवजी की उपासना शुरू की। शिव लोभासुर से प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसे निर्भय होने का वरदान दिया। इसके बाद लोभासुर ने सारे लोकों पर कब्जा कर लिया। तब देवगुरु ने सारे देवताओं को गणेश की उपासना करने की सलाह दी। गणेश ने गजानन रूप में दर्शन दिए और देवताओं को वरदान दिया कि मैं लोभासुर को पराजित करूंगा। गणेशजी ने लोभासुर को युद्ध के लिए संदेश भेजा। शुक्राचार्य की सलाह पर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली।
6. लंबोदर | Lambodar| –
क्रोधासुर नाम के दैत्य ने ने सूर्यदेव की उपासना करके उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण सारे देवता भयभीत हो गए। वो युद्ध करने निकल पड़ा। तब गणपति ने लंबोदर रूप धरकर उसे रोक लिया। क्रोधासुर को समझाया और उसे ये आभास दिलाया कि वो संसार में कभी अजेय योद्धा नहीं हो सकता। क्रोधासुर ने अपना विजयी अभियान रोक दिया और सब छोड़कर पाताल लोक में चला गया।
7. विघ्नराज | Vighnaraj | –
एक बार पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत के दौरान जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम (ममता) रख दिया। वह माता पार्वती से मिलने के बाद वन में तप के लिए चला गया। वहीं वो शंबरासुर से मिला। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियां सीखा दीं। उसने मम को गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर ब्रह्माण्ड का राज मांग लिया। शम्बर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। ममासुर ने भी अत्याचार शुरू कर दिए और सारे देवताओं को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। तब देवताओं ने गणेश की उपासना की। गणेश विघ्नेश्वर के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर का मान मर्दन कर देवताओं को छुड़वाया।
8. धूम्रवर्ण |Dhoomvarna| –
एक बार सूर्यदेव को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। वो शुक्राचार्य के समीप गया और उन्हें गुरु बना लिया। वह अहम से अहंतासुर हो गया। उसने खुद का एक राज्य बसा लिया और भगवान गणेश को तप से प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिए। उसने भी बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया। उनका रंग धुंए जैसा था। वे विकराल थे। उनके हाथ में भीषण पाश था जिससे बहुत ज्वालाएं निकलती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को हरा दिया। उसे युद्ध में हराकर अपनी भक्ति प्रदान की।




इस कारण स्त्रियां कभी नहीं फोड़ती है नारियल !

इस कारण स्त्रियां कभी नहीं फोड़ती है नारियल !

नारियल को श्रीफल के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी मान्यता है की जब भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर अवतार लिया तो वे अपने साथ तीन चीजें- लक्ष्मी, नारियल का वृक्ष तथा कामधेनु लाए इसलिए नारियल के वृक्ष को श्रीफल भी कहा जाता है। श्री का अर्थ है लक्ष्मी अर्थात नारियल लक्ष्मी व विष्णु का फल। नारियल में त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना गया है। श्रीफल भगवान शिव का परम प्रिय फल है। मान्यता अनुसार नारियल में बनी तीन आंखों को त्रिनेत्र के रूप में देखा जाता है। श्रीफल खाने से शारीरिक दुर्बलता दूर होती है। इष्ट को नारियल चढ़ाने से धन संबंधी समस्याएं दूर हो जाती हैं।
Why ladies don't break coconut in Hindi, Striyan Nariyal kyon nahin fodti hai
भारतीय पूजन पद्धति में नारियल अर्थात श्रीफल का महत्वपूर्ण स्थान है। कोई भी वैदिक या दैविक पूजन प्रणाली श्रीफल के बलिदान के बिना अधूरी मानी जाती है। यह भी एक तथ्य है कि महिलाएं नारियल नहीं फोड़तीं। श्रीफल बीज रूप है, इसलिए इसे उत्पादन अर्थात प्रजनन का कारक माना जाता है। श्रीफल को प्रजनन क्षमता से जोड़ा गया है। स्त्रियों बीज रूप से ही शिशु को जन्म देती हैं और इसलिए नारी के लिए बीज रूपी नारियल को फोड़ना अशुभ माना गया है। देवी-देवताओं को श्रीफल चढ़ाने के बाद पुरुष ही इसे फोड़ते हैं। शनि की शांति हेतु नारियल के जल से शिवलिंग पर रुद्रभिषेक करने का शास्त्रीय विधान भी है।
भारतीय वैदिक परंपरा अनुसार श्रीफल शुभ, समृद्धि, सम्मान, उन्नति और सौभाग्य का सूचक माना जाता है। किसी को सम्मान देने के लिए उनी शॉल के साथ श्रीफल भी भेंट किया जाता है। भारतीय सामाजिक रीति-रिवाजों में भी शुभ शगुन के तौर पर श्रीफल भेंट करने की परंपरा युगों से चली आ रही है। विवाह की सुनिश्चित करने हेतु अर्थात तिलक के समय श्रीफल भेंट किया जाता है। बिदाई के समय नारियल व धनराशि भेंट की जाती है। यहां तक की अंतिम संस्कार के समय भी चिता के साथ नारियल जलाए जाते हैं। वैदिक अनुष्ठानों में कर्मकांड में सूखे नारियल को वेदी में होम किया जाता है।
श्रीफल कैलोरी से भरपूर होता है। इसकी तासीर ठंडी होती है। इसमें अनेक पोषक तत्व होते हैं। इसके कोमल तनों से जो रस निकलता है उसे नीरा कहते हैं उसे लज्जतदार पेय माना जाता है। सोते समय नारियल पानी पीने से नाड़ी संस्थान को बल मिलता है तथा नींद अच्छी आती है।
इसके पानी में पोटेशियम और क्लोरीन होता है जो मां के दूध के समान होता है। जिन शिशुओं को दूध नहीं पचता उन्हें दूध के साथ नारियल पानी मिलाकर पिलाना चाहिए। डि-हाइड्रेशन होने पर नारियल पानी में नीबू मिलाकर पिया जाता है। इसकी गिरी खाने से कामशक्ति बढ़ती है। मिश्री संग खाने से गर्भवती स्त्री की शारीरिक दुर्बलता दूर होती है तथा बच्चा सुंदर होता है।

किस किस को दिया गीता का उपदेश?

जानिए किसने, किसको, कब-कब दिया गीता का उपदेश?

यह तो हम सभी जानते है की कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। लेकिन श्रीकृष्ण और अर्जुन के अलावा भी गीता को कई बार बोला व सुना गया। आइए जानते है कि गीता का उपदेश, किसने, किसको और कब-कब दिया।


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भगवान श्रीकृष्ण ने सूर्यदेव को
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जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे हैं, तब उन्होंने ये भी बोला था कि ये उपदेश पहले वे सूर्यदेव को दे चुके हैं। तब अर्जुन ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि सूर्यदेव तो प्राचीन देवता हैं तो आप सूर्यदेव को ये उपदेश पहले कैसे दे सकते हैं। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि तुम्हारे और मेरे पहले बहुत से जन्म हो चुके हैं। तुम उन जन्मों के बारे में नहीं जानते, लेकिन मैं जानता हूं। इस तरह गीता का ज्ञान सर्वप्रथम अर्जुन को नहीं बल्कि सूर्यदेव को प्राप्त हुआ था
संजय ने धृतराष्ट्र को

जब भगवान श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे थे, उस समय संजय (धृतराष्ट्र के सारथी, जिन्हें महर्षि वेदव्यास ने दिव्य दृष्टि दी थी) अपनी दिव्य दृष्टि से वह सब देख रहे थे और उन्होंने गीता का उपदेश धृतराष्ट्र को सुनाया था।
महर्षि वेदव्यास ने भगवान श्रीगणेश को

जब महर्षि वेदव्यास ने मन ही मन महाभारत की रचना की तो बाद में उन्होंने सोच की इसे मैं अपने शिष्यों को कैसे पढ़ाऊं? महर्षि वेदव्यास के मन की बात जानकर स्वयं ब्रह्मा उनके पास आए। महर्षि वेदव्यास ने उन्हें महाभारत ग्रंथ की रचना के बारे में बताया और कहा कि इस पृथ्वी पर इसे लिखने वाले कोई नहीं है। तब ब्रह्मदेव ने कहा कि आप इसके काम के लिए श्रीगणेश का आवाहन कीजिए। महर्षि वेदव्यास के कहने पर श्रीगणेश ने ही महाभारत ग्रंथ का लेखन किया। महर्षि वेदव्यास बोलते जाते थे और श्रीगणेश लिखते जाते थे। इसी समय महर्षि वेदव्यास ने श्रीगणेश को गीता का उपदेश दिया था।
महर्षि वेदव्यास ने वैशम्पायन और अन्य शिष्यों को

जब भगवान श्रीगणेश ने महाभारत ग्रंथ का लेखन किया। उसके बाद महर्षि वेदव्यास ने अपने शिष्यों वैशम्पायन, जैमिनी, पैल आदि को महाभारत के गूढ़ रहस्य समझाए। इसी के अंतर्गत महर्षि वेदव्यास ने गीता का ज्ञान भी अपने शिष्यों को दिया।
वैशम्पायन ने राजा जनमेजय और सभासदों को

पांडवों के वंशज राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्प यज्ञ किया था। इस यज्ञ के पूरे होने पर महर्षि वेदव्यास अपने शिष्यों के साथ राजा जनमेजय की सभा में गए। वहां राजा जनमेजय ने अपने पूर्वजों (पांडव व कौरवों) के बारे में महर्षि वेदव्यास से पूछा। तब महर्षि वेदव्यास के कहने पर उनके शिष्य वैशम्पायन ने राजा जनमेजय की सभा में संपूर्ण महाभारत सुनाई थी। इसी दौरान उन्होंने गीता का उपदेश भी वहां उपस्थित लोगों को दिया था।
ऋषि उग्रश्रवा ने शौनक को

लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूतवंश के श्रेष्ठ पौराणिक थे। एक बार जब वे नैमिषारण्य पहुंचे तो वहां कुलपति शौनक 12 वर्ष का सत्संग कर रहे थे। जब नैमिषारण्य के ऋषियों व शौनकजी ने उन्हें देखा तो उनसे कथाएं सुनाने का आग्रह किया। तब उग्रश्रवा ने कहा कि मैंने राजा जनमेजय के दरबार में ऋषि वैशम्पायन के मुख से महाभारत की विचित्र कथा सुनी है, वही मैं आप लोगों को सुनाता हूं। इस तरह ऋषि उग्रश्रवा ने शौनकजी के साथ-साथ नैमिषारण्य में उपस्थित तपस्वियों को महाभारत की कथा सुनाई। इसी दौरान उन्होंने गीता का उपदेश भी दिया था।

अच्छी सेहत के लिए

अच्छी सेहत के लिए टूथब्रश की सफाई भी है जरूरी


आपकी दिनचर्या के सामान में एक महत्वपूर्ण सामग्री है। यह आपके दांतों को साफ और लंबे 

समय तक सेहतमंद बनाए रखने में मदद करता है, इसलिए आपको इसे भी साफ-सुथरा रखना 

बहुत जरूरी हो जाता है। यदि आप अपने टूथब्रश की सफाई नहीं करते हैं तो इसमें जमी गदंगी 

आपके दांतों की सेहत के साथ ही अन्य कई प्रकार से आपकी सेहत को नुकसान पहुंचा सकती है।

1. आपको अपने टूथब्रश को हर 3 महीने के अंतराल में बदल लेना चाहिए।

2. जब तक पुराना टूथब्रश इस्तेमाल कर रहे हों तब तक दांत साफ करने के साथ ही इसे भी रोजाना साफ करें।

3. अगर आप किसी लंबी बीमारी से ठीक होकर उठे हैं तो अब से आप नया टूथब्रश इस्तेमाल करना शुरु करें।
4. ब्रश करने के बाद टूथब्रश को सीधा खड़ा करके रखें, जिससे कि उसका पानी निकल जाए और वह सुखा रहें।
5. इन दिनों ऐसे टूथब्रश भी मिल रहे हैं जिनमें ब्रश के ब्रिसल को ढ़ंक कर रखने के लिए छोटा सा 

बॉक्स ढक्कन भी साथ रहा हैं। यह तरीका सही नहीं है, आपको अपने टूथब्रश को ढक्कन  

बॉक्स में बंद करके नहीं रखना चाहिए। गिले ब्रश को ढकने से उसमें कीटाणु पनपने लगते है।

6. यदि आप बाथरूम में टूथब्रश रखते हैं तो यह कमोड से कम से कम 2 फीट या इससे भी अधिक 

दूरी पर होना चाहिए क्योंकि फ्लश करते समय पानी में मौजूद बैक्टीरिया हवा से पूरे बाथरूम में 

फैल जाते हैं और आपके टूथब्रश पर भी जाकर जमा हो जाते हैं। कमोड के इस्तेमाल के बाद इसे ढक़ दें।

7. अपने टूथब्रश होल्डर को नियमित तौर पर साफ करना भी जरुरी है। आप इसे हफ्ते में एक बार जरूर साफ़ करें।
8. टूथब्रश होल्डर में घर के सभी सदस्यों के ब्रश को पास-पास चिपकाकर रखें। इससे एक टूथब्रश के बैक्टीरिया आसानी से 
दूसरे टूथब्रश में चले जाते है। सभी के टूथब्रश को इस तरह से रखें कि वे आपस में टच हों।

9. ब्रश को साफ करने के लिए उबलते हुए पानी में इसे 5 मिनट के लिये डालें। चाहे तो पानी में बेकिंग सोडा भी डाल सकते है, यह एक असरदार सफाई करने वाला एजेंट है।


धूम्रपान वालों के लिए

 W H O के अनुसार दुनिया में हर साल लगभग 64 लाख लोगों की डेथ स्मोकिंग की वजह से होती है। इनमें से 9 लाख लोगों की मौत भारत में होती है। इसकी गंभीरता को देखते हुए WHO ने वर्ष 1987 से वर्ल्ड नो टोबेको डे मनाने का निर्णय लिया ताकि लोगों को स्मोकिंग के नुकसान के बारे में जागरुक किया जा सके। स्मोकिंग को लेकर कई तरह के मिथ प्रचलित हैं, जैसे अगर डाइट अच्छी है तो बॉडी पर इसका निगेटिव असर कम होता है। लेकिन यह बिल्कुल सच नहीं है। ऐसे और भी कई मिथ हैं। आज हम आपको बता रहे है स्मोकिंग से जुड़े 5 ऐसे ही मिथ और उनकी सच्चाई-


Myth – सिगरेट पीने के साथ अगर हेल्दी डाइट ली जाए तो फिर इससे नुकसान नहीं होगा।
Fact – सिगरेट का सीधा असर लंग्स पर पड़ता है जिसका डाइट से कोई संबंध नहीं है। इसलिए हेल्दी डाइट लेने पर भी सिगरेट नुकसान करेगी ही।
Myth – लाइट या माइल्ड सिगरेट ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाती है।
Fact – स्टडीज के अनुसार लाइट सिगरेट पीते समय स्मोकर्स ज्यादा तेजी से धुआं खींचते हैं। इससे लाइट सिगरेट भी रेग्युलर सिगरेट जितना ही नुकसान पहुंचाती है।
Myth – ई-सिगरेट नुकसान नहीं पहुंचाती है।
Fact – स्टडीज के अनुसार ई-सिगरेट में भी नार्मल सिगरेट की तरह हार्मफुल केमिकल्स पाए जाते हैं। इससे भी कैंसर की प्रॉब्लम हो सकती है।
Myth – सिगरेट में मौजूद सिर्फ निकोटिन और टार ही नुकसान पहुंचाते हैं।
Fact – सिगरेट में सिर्फ निकोटिन और टार नहीं होता है। इसके अलावा इसमें एरोमेटिक हाइड्रोकार्बन जैसे कई हार्मफुल केमिकल्स होते हैं जो कैंसर की प्रॉब्लम पैदा करते हैं।

 Myth – सिगरेट पीने के साथ अगर हेल्दी डाइट ली जाए तो फिर इससे नुकसान नहीं होगा।
Fact – सिगरेट का सीधा असर लंग्स पर पड़ता है जिसका डाइट से कोई संबंध नहीं है। इसलिए हेल्दी डाइट लेने पर भी सिगरेट नुकसान करेगी ही।

Myth – लाइट या माइल्ड सिगरेट ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाती है।
Fact – स्टडीज के अनुसार लाइट सिगरेट पीते समय स्मोकर्स ज्यादा तेजी से धुआं खींचते हैं। इससे लाइट सिगरेट भी रेग्युलर सिगरेट जितना ही नुकसान पहुंचाती है।

Myth – ई-सिगरेट नुकसान नहीं पहुंचाती है।
Fact – स्टडीज के अनुसार ई-सिगरेट में भी नार्मल सिगरेट की तरह हार्मफुल केमिकल्स पाए जाते हैं। इससे भी कैंसर की प्रॉब्लम हो सकती है।
Myth – सिगरेट में मौजूद सिर्फ निकोटिन और टार ही नुकसान पहुंचाते हैं।
Fact – सिगरेट में सिर्फ निकोटिन और टार नहीं होता है। इसके अलावा इसमें एरोमेटिक हाइड्रोकार्बन जैसे कई हार्मफुल केमिकल्स होते हैं जो कैंसर की प्रॉब्लम पैदा करते हैं।
Myth – अगर सिगरेट की मात्रा कम कर दी जाए तो फिर इससे नुकसान नहीं होगा।
Fact– दिनभर में चाहे एक सिगरेट पिएं या दो, इससे लंग्स को नुकसान पहुंचता ही है। सिगरेट की मात्रा कम करने से तलब और बढ़ जाती है। इसलिए स्मोकिंग छोड़ना ही बेहतर ऑप्शन है।

भगवान श्रीकृष्ण की माखनचोरी लीला

ब्रज घर-घर प्रगटी यह बात। दधि माखन चोरी करि लै हरि, ग्वाल सखा सँग खात।। ब्रज-बनिता यह सुनि मन हरषित, सदन हमारैं आवैं। माखन खात अचानक...