google-site-verification=NjzZlC7Fcg_KTCBLvYTlWhHm_miKusof8uIwdUbvX_U पौराणिक कथा

Saturday, May 18, 2019

युधिष्ठिर, इस घटना के बाद हमेशा सच बोलते थे…

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पुराणों में ऐसी कई कहानी और कथाएं हैं जिन्हे सुनकर आप सभी हैरान हो सकते हैं. ऐसे में आज हम एक ऐसी ही कथा आपको बताने जा रहे हैं जिसे आपने पहले कभी नहीं सुना होगा. जी हाँ, यह कथा युधिष्ठिर और उनके गुरु से जुडी है. आइए जानते हैं.

कथा – गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों को शास्त्रों से लेकर शस्त्रों तक की शिक्षा देते थे. उनकी कोशिश रहती थी कि उनके विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास हो. एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों को पाठ पढ़ाया- ‘सत्यं-वद्’. इस मंत्र का अनेक बार उच्चारण करवाया, फिर शिष्यों से कहा इसे कल अच्छी तरह याद करके आना. सभी विद्यार्थी उन चार अक्षर वाले मंत्र को दूसरे दिन याद करके पहुंचे! लेकिन कक्षा में युधिष्ठिर ने खड़े होकर कहा- ‘गुरुदेव मुझे अभी यह पाठ याद नहीं हुआ.’
गुरुजी ने कहा- ‘ठीक है, कोई बात नहीं कल याद कर लाना’. अब गुरुजी ने अन्य विद्यार्थियों को अन्य पाठ पढ़ा दिया. दूसरे दिन जब गुरुजी ने युधिष्ठिर से पाठ सुनाने के लिए बोला, तब भी युधिष्ठिर ने कहा- ‘याद नहीं हुआ’.इस प्रकार कई दिन तक युधिष्ठिर यही कहते रहे कि ये मंत्र बड़ा कठिन है, सही प्रकार से याद ही नहीं हो पा रहा है. दो सप्ताह बाद गुरुजी युधिष्ठिर को डांटते हुए बोले, ‘इतने दिन हो गए, चार अक्षर याद नहीं होते’? युधिष्ठिर बोले- ‘लिखने और पढ़ने की दृष्टि से यह मंत्र बहुत छोटा है. कुछ पल में याद हो सकता है, पर इससे क्या होगा? जब तक इस मंत्र का अर्थ और भाव व्यवहार में न आ जाय, तब तब उसका याद करना बेकार है. मैं ‘सत्यं वद्- ‘सत्य बोलो’ की शिक्षा को अपने व्यवहार में उतारने की कोशिश कर रहा हूं. अभी पुरानी अनावश्यक झूठ बोलने की आदत के कारण सत्य बोलने का पाठ पक्का नहीं हो पा रहा है, इसलिए इतने दिन लग रहे हैं. जब यह पाठ मेरे आचरण में पक्का हो जाएगा, मैं तब मानूंगा यह मुझे याद हो गया है.’
युधिष्ठिर की ऐसी सच्ची बातें सुनकर गुरु द्रोणाचार्य बड़े प्रसन्न हुए. युधिष्ठिर ने ‘सत्यं वद्’ के पाठ को जीवन में ऐसा पक्का किया कि वो सत्यवादी बन गए और जीवन भर उसको निभाते रहे. हम शास्त्रों को तो पूजते हैं, लेकिन शास्त्रों में लिखी बात नहीं मानते. शास्त्रों के प्रति सच्ची श्रद्धा यही है कि शास्त्र में लिखी बातों को जीवन का हिस्सा बनाए, जिससे हमारा जीवन निखरेगा और सर्वांगीण विकास होगा.

Friday, May 17, 2019

ये पौराणिक कथा जो बताती है समुद्र के खारे पानी का रहस्य…


ये पौराणिक कथा जो बताती है समुद्र के खारे पानी का रहस्य...

क्या आपने कभी सोचा है की समुद्र का पानी खारा क्यों होता है? जबकि शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान् विष्णु जिस सागर में निवास करते है वह मीठे पानी व दूध से निर्मित सागर है जिसे क्षीरसागर के नाम से जाना जाता है. लेकिन हकीकत में देखा जाए तो इस पृथ्वी पर जितने भी समुद्र है सभी का पानी खारा है. क्या आप जानते है समुद्र के इस खारे पानी के होने का क्या कारण है पौराणिक मान्यता है की महाराजा पृथु के पुत्रों ने जिस सात समुद्र का निर्माण किया था वह सभी मीठे पानी व दूध की भांति थे. समुद्र के पानी का खारा होने के पीछे एक पौराणिक रहस्य है आइये जानते है.

पौराणिक कथा – इस कथा के अनुसार जब माता पार्वती भगवान् शिव को पति के रूप में पाने के लिए घोर तपस्या कर रही थी तो उनकी तपस्या के प्रभाव से तीनों लोक कांपने लगे. जिससे भयभीत होकर सभी देवता एकत्र होकर इस विषय में विचार विमर्श करने लगे. किन्तु समुद्र देव माता पार्वती की सुन्दरता पर मोहित हो चुके थे जिसके वशीभूत होकर उन्होंने अपने विचार सभी देवताओं के समक्ष रखे और भगवान् शिव के विषय में भला-बुरा कहने लगे. समुद्र देव की इस बात के लिए भगवान शिव व सभी देवताओं में क्षमा कर दिया. जिसके कारण समुद्रदेव का अहंकार और अधिक बढ़ गया और वह माता पार्वती के समक्ष उपस्थित हो गए और उनके समक्ष विवाह प्रस्ताव रखा पर माता पार्वती ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.
जिससे समुद्रदेव को बहुत क्रोध आया और अपने अहंकार के वशीभूत होकर उन्होंने भगवान् शिव के विषय में माता पार्वती से खूब भला-बुरा कहा व भगवान् शिव को श्मशान निवासी, अघोरी, भस्मधारी आदि नामों से संबोधित कर माता पार्वती से अपने निर्णय को बदलने के लिए कहा. और कहा की उसका समुद्र मीठे पानी व दूध से भरपूर है जिसकी वजह से वह माता पार्वती को पत्नी बनाने का आधिकारी है. समुद्रदेव के कथनों को सुनकर माता पार्वती को बहुत क्रोध आया और उन्होंने समुद्रदेव को श्राप दिया कि उसे जिस मीठे व दूध जैसे पानी पर अभिमान है वह जल खारा हो जाए और किसी के पीने योग्य न रहे. इसी वजह से सभी समुद्रों का पानी खारा होता है.

भगवान की खोज !

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तेरहवीं सदी में महाराष्ट्र में एक प्रसिद्द संत हुए संत नामदेव। कहा जाता है कि जब वे बहुत छोटे थे तभी से भगवान की भक्ति में डूबे रहते थे। बाल -काल में ही एक बार उनकी माता ने उन्हें भगवान विठोबा को प्रसाद चढाने के लिए दिया तो वे उसे लेकर मंदिर पहुंचे और उनके हठ के आगे भगवान को स्वयं प्रसाद ग्रहण करने आना पड़ा।  आज हम उसी महान संत से सम्बंधित एक प्रेरक प्रसंग आपसे साझा कर रहे हैं।

एक बार संत नामदेव अपने शिष्यों को ज्ञान -भक्ति का प्रवचन दे रहे थे। तभी श्रोताओं में बैठे किसी शिष्य ने एक प्रश्न किया , ” गुरुवर , हमें बताया जाता है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है , पर यदि ऐसा है तो वो हमें कभी दिखाई क्यों नहीं देता , हम कैसे मान लें कि वो सचमुच है , और यदि वो है तो हम उसे कैसे प्राप्त कर सकते हैं ?

नामदेव मुस्कुराये और एक शिष्य को एक लोटा पानी और थोड़ा सा नमक लाने का आदेश दिया।
शिष्य तुरंत दोनों चीजें लेकर आ गया।
वहां बैठे शिष्य सोच रहे थे कि भला इन चीजों का प्रश्न से क्या सम्बन्ध , तभी संत नामदेव ने पुनः उस शिष्य से कहा , ” पुत्र , तुम नमक को लोटे में डाल कर मिला दो। “
शिष्य ने ठीक वैसा ही किया।
संत बोले , ” बताइये , क्या इस पानी में किसी को नमक दिखाई दे रहा है ?”
सबने  ‘नहीं ‘ में सिर हिला दिए।
“ठीक है !, अब कोई ज़रा इसे चख कर देखे , क्या चखने पर नमक का स्वाद आ रहा है ?”, संत ने पुछा।
“जी ” , एक शिष्य पानी चखते हुए बोला।
“अच्छा , अब जरा इस पानी को कुछ देर उबालो।”, संत ने निर्देश दिया।
कुछ देर तक पानी उबलता रहा और जब सारा पानी भाप बन कर उड़ गया , तो संत ने पुनः शिष्यों को लोटे में देखने को कहा और पुछा , ” क्या अब आपको इसमें कुछ दिखाई दे रहा है ?”
“जी , हमें नमक के कण दिख रहे हैं।”, एक शिष्य बोला।
संत मुस्कुराये और समझाते हुए बोले ,” जिस प्रकार तुम पानी में नमक का स्वाद तो अनुभव कर पाये पर उसे देख नहीं पाये उसी प्रकार इस जग में तुम्हे ईश्वर हर जगह दिखाई नहीं देता पर तुम उसे अनुभव कर सकते हो। और जिस तरह अग्नि के ताप से पानी भाप बन कर उड़ गया और नमक दिखाई देने लगा उसी प्रकार तुम भक्ति ,ध्यान और सत्कर्म द्वारा अपने विकारों का अंत कर भगवान को प्राप्त कर सकते हो।”

शिव के गण नंदी की कहानी

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पौराणिक दंत कथा अनुसार, एक बार शिवजी के निवास स्थान पर कुछ दुष्ट व्यक्ति प्रवेश कर जाते हैं। इस बात का बोध होते ही शिवजी नंदी को कुछ निर्देश देना के लिए बुलाते हैं लेकिन अतिउत्साही नंदी शिवजी को अनसुना कर के उन दुष्टों के पीछे भाग पड़ता है।
नंदी के इस अबोध आचरण से क्रोधित हो कर भगवान शिव नंदी को आज्ञा देते हैं-
आज से तुम्हारा स्थान मेरे निवास स्थान के बाहर ही रहेगा।
इसी कारण आज के समय में भी भगवान शिव के प्रिय नंदी का स्थान मंदिर के बाहर ही स्थापित किया जाता है।
सार / Moral of the story- बिन सोचे समझे किसी कार्य में अमल करने पर अपार विपदा आ सकती है। जब कोई ज्ञानी व्यक्ति कुछ बोल रहा हो तब उनकी बात काटनी नहीं चाहिए और उन्हे अनसुना नहीं करना चाहिए।

कर्ण की निष्ठा

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एक राज पुत्र होते हुए भी कर्ण सूत पुत्र कहा गया। कर्ण एक महान दानवीर था। अपनें प्रण और वचन के लिए कर्ण अपनें प्राणों की भी बलि दे सकता था। पांडवों की शिक्षा खतम होने के बाद आयोजित रंग-भूमि में आकर कर्ण अर्जुन को ललकारता है  कि अगर वह संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुरधर है तो उससे मुक़ाबला कर के सिद्ध करे।

कर्ण एक सूत के घर पला-बढ़ा होता है, इसलिए उसे सूत पुत्र समझ कर अर्जुन से मुक़ाबला नहीं करने दिया जाता है। पांडवों के प्रखर विरोधी दुर्योधन को यहाँ एक अवसर दिखता है, और वह फौरन कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर देता है। और कर्ण को अपना मित्र बना लेता है।
दुर्योधन के इस कृत्य से कर्ण के दुखते घावों पर मरहम लग जाता है। लेकिन समय सीमा खत्म होने के कारण रंगभूमि में कर्ण-अर्जुन का मुक़ाबला टल जाता है।
पांडवो और कौरवों के अंतिम निर्णायक युद्ध के पहले भगवान कृष्ण कर्ण को यह भेद बताते हैं कि तुम एक पांडव हो और कुंती के ज्येष्ठ पुत्र हो। इस रहस्य को जान कर भी कर्ण अपनें मित्र दुर्योधन से घात कर के अपनें भाइयों की ओर नहीं जाता है।
दिव्य कवच-कुंडल के साथ कर्ण अजेय था और महाभारत के युद्ध में पांडव कभी उसे परास्त नहीं कर पाते। अतः इन्द्रदेव उससे सुबह स्नान के समय ब्राह्मण स्वरूप में आ कर दान में कवच-कुंडल मांगते हैं। पिता सूर्य देव द्वारा दिखाए गए स्वप्न से कर्ण को यह बात पहले ही ज्ञात हो जाती है कि इंद्र देव उससे रूप बदल कर कवच-कुंडल मांगने आयेंगे।
पर फिर भी दानवीर कर्ण ब्राह्मण रुपी इंद्र देव को खाली हाथ नहीं लौटता और उनकी मांग पूरी करता है। इंद्र देव कवच-कुंडल के बदले में कर्ण को एक शक्ति अस्त्र प्रदान करते हैं, जिसका इस्तेमाल सिर्फ एक बार किया जा सकता था और उसका कोई काट नहीं था।
युद्ध के दौरान भीम का पुत्र घटोत्कच कौरव सेना को तिनकों की तरह उड़ाए जा रहा था। उसने दुर्योधन को भी लहूलहान कर दिया। तब दुर्योधन सहायता मांगने कर्ण के पास आया। कर्ण शक्ति अस्त्र सिर्फ अर्जुन पर इस्त्माल करना चाहता था, पर मित्रता से विवश हो कर उसने वह अस्त्र भीम पुत्र घटोत्कच कर चला दिया। और उसका अंत कर दिया। और इस तरह अर्जुन सुरक्षित हो गया।
अपनें साथ दो-दो शापों का बोझ ले कर चल रहे कर्ण को यह बात पता थी की जहां धर्म है वहीं कृष्ण होते हैं और जहां कृष्ण है वहीं विजय भी होती है। फिर भी उसने न दुर्योधन के एहसान भूल कर उससे घात किया, और ना ही अपनी दानवीरता से कभी पीछे हटा।
सार- हो सके तो किसी के ऋणी मत बनो, और एक बार अगर किसी के ऋणी बन ही जाओ तो ऋण चुकाने में आनाकानी मत करो। अगर कोई कुछ मांगने आए तो उसे निराश नहीं करना चाहिए, जितना संभवतः हो उसकी मदद करनी चाहिए।

लक्ष्मण को मिला ज्ञान

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श्री राम और रावण के बीच हुए अंतिम युद्ध के बाद रावण जब युद्ध भूमि पर, मरणशैया पर पड़ा होता है तब भगवान राम लक्ष्मण को समस्त वेदो के ज्ञाता, महापंडित रावण से राजनीति और शक्ति का ज्ञान प्राप्त करने को कहते हैं।
और तब रावण लक्ष्मण को ज्ञान देते है कि-
  • अच्छे कार्य में कभी विलंब नहीं करना चाहिए। और अशुभ कार्य को मोह वश करना ही पड़े तो उसे जितना हो सके उतना टालने का प्रयास करनी चाहिए।
  • शक्ति और पराक्रम के मद में इतना अँधा नहीं हो जाना चाहिए की हर शत्रु तुच्छ और निम्न लगने लगे। मुझे ब्रह्मा जी से वर मिला था की वानर और मानव के अलावा कोई मुझे मार नहीं सकता। फिर भी मै उन्हे तुच्छ और निम्न समझ कर अहम में लिप्त रहा। जिस कारण मेरा समूल विनाश हुआ।
  • तीसरी और अंतिम बात रावण नें यह कही कि, अपनें जीवन के गूढ रहस्य स्वजन को भी नहीं बताने चाहिए। चूँकि रिश्ते और नाते बदलते रहते हैं। जैसे की विभीषण जब लंका में था तब मेरा हितेच्छु था। पर श्री राम की शरण में आने के बाद मेरे विनाश का माध्यम बना।
सार- अपनें गूढ़ रहस्य अपनें तक रखना, शुभ कर्म में देरी ना करना, गलत काम से परहेज़ करना, और किसी भी शत्रु को कमज़ोर ना समझना , यह अमूल्य पाठ हर एक इंसान को अपनें जीवन में उतारना चाहिए।

कूर्म जयंती : क्यों लिया था भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार

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हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लेकर समुद्र मंथन में सहायता की थी। भगवान विष्णु के 
को कच्छप अवतार भी कहते हैं।

वर्ष 2019 में कूर्म जयंती 18 मई को मनाई जा रही है। कूर्म जयंती वैशाख मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु कच्छप (कछुआ) अवतार लेकर प्रकट हुए थे। साथ ही समुद्र मंथन के वक्त अपनी पीठ पर मंदार पर्वत को उठाकर रखा था।

इसकी कथा इस प्रकार है- एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवताओं के राजा इंद्र को श्राप देकर श्रीहीन कर दिया। इंद्र जब भगवान विष्णु के पास गए तो उन्होंने समुद्र मंथन करने के लिए कहा। तब इंद्र भगवान विष्णु के कहे अनुसार दैत्यों व देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गए।
समुद्र मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। देवताओं और दैत्यों ने अपना मतभेद भुलाकर मंदराचल को उखाड़ा और उसे समुद्र की ओर ले चले, लेकिन वे उसे अधिक दूर तक नहीं ले जा सके। तब भगवान विष्णु ने मंदराचल को समुद्र तट पर रख दिया। देवता और दैत्यों ने मंदराचल को समुद्र में डालकर नागराज वासुकि को 

नेती बनाया।

किंतु मंदराचल के नीचे कोई आधार नहीं होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा। यह देखकर भगवान विष्णु विशाल कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर समुद्र में मंदराचल के आधार बन गए। भगवान कूर्म की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घूमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन संपन्न हुआ।

भगवान श्रीकृष्ण की माखनचोरी लीला

ब्रज घर-घर प्रगटी यह बात। दधि माखन चोरी करि लै हरि, ग्वाल सखा सँग खात।। ब्रज-बनिता यह सुनि मन हरषित, सदन हमारैं आवैं। माखन खात अचानक...