google-site-verification=NjzZlC7Fcg_KTCBLvYTlWhHm_miKusof8uIwdUbvX_U पौराणिक कथा

Saturday, May 18, 2019

अद्भुत चमत्कार, शिरडी के श्री सांई बाबा के जानिए…

शिरडी वाले श्री सांईबाबा जिनके दर्शनमात्र से ही श्रद्धालु अपने जीवन को धन्य मान लेते थे, वहीं आज भी श्री सांई बाबा के समाधि मंदिर में बाबा की एक झलक पाकर श्रद्धालु अभिभूत हो उठते हैं। श्रद्धालुओं को आज भी बाबा के जीवंत होने की अनुभूति होती हैं श्रद्धालुओं का मानना है कि बाबा आज भी अपने श्रद्धालुओं की करूण पुकार सुनकर दौड़े चले आते हैं। श्री सांई बाबा की पावन धुन श्रद्धालुओं को सभी कष्टों से बचाती है। आज भी ऐसे कई श्रद्धालु मौजूद हैं जो बाबा का स्मरण करने मात्र से अपने को दुखों से दूर पाते हैं। श्री सांईबाबा स्वयं इस सृष्टि के पालनहार थे लेकिन फिर भी अपने भक्तों के बीच सादा जीवन जीया करते थे।
वे एक फकीर की तरह भिक्षामांगते और एकत्रित किए गए धान्य, अन्न को अपनी हांडी में पकाकर सभी को प्रेम से भोजन करवाते थे। उन्होंने मानवता का संदेश दिया था। तभी से रामनवमी पर श्री सांई बाबा मंदिरों में भंडारों का आयोजन होता है। आज भी शिरडी में बाबा की पावन स्मृतियां श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचती है और बाबा के प्रेम को दुगना कर देती हैं। शिरडी के सांई बाबा ऐसे ही अंर्तयामी व्यक्तित्व से परिपूर्ण थे। उनमें अद्भुत योग शक्ति थी। कभी वे अपनी योग शक्ति से पतली सी लकड़ी पर बने कमजोर से आसन पर भी आसानी से बैठ जाया करते थे तो कभी इनके भक्त इन्हे बग्घी में विराजित कर इनकी शोभायात्रा निकालते थे।
एक बार एक भक्त को श्री सांई बाबा से जुड़ा ऐसा ही चमत्कारिक अनुभव हुआ। इस दौरान उक्त भक्त जब बाबा से मिलने पहुंचे तो उन्हें बाबा का शरीर कई टुकड़ों में बांट लिया था। उन्हें लगा कि किसी ने बाबा का खून कर दिया है। इस वजह से वे दौड़कर बाबा के अन्य भक्तों को सूचित करने पहुंचे लेकिन जब वे लौटे तो आश्चर्य में पड़ गए बाबा हमेशा की तरह द्वाकामाई में बैठकर मुस्कुरा रहे थे और भक्त स्वयं द्वारा देखे गए दृश्य पर आश्चर्य व्यक्त कर रहा था।

भगवान शिव इस वजह से पहनते हैं, शेर की खाल…

हम सभी इस बात से वाकिफ हैं कि भगवान शिव की पूजा अर्चना का शुभ दिन सोमवार माना जाता है. ऐसे में कहते हैं कि इस दिन इनकी पूजा करने से शिव पूजा का फल जल्दी मिलता है और इसी के साथ ही भगवान शिव को भोले भंड़ारी कहा जाता है. जी हाँ, भगवान शिव भक्तो पर जल्दी कृपा करने वाले देव माने जाते हैं और वह अपने भक्तों की सभी बातों को मान लेते हैं. ऐसे में भगवान शिव की वेशभूषा काफी रहस्य भरी है, भगवान शिव शेर की खाल पहनते हैं. अब बहुत से लोग इस बात को नहीं जानते हैं कि शिव भगवान आखिर शेर की खाल क्यों पहनते हैं. तो अगर आप भी इस बात से नहीं वाकिफ हैं तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि आखिर क्यों शिव भगवान शेर की खाल पहनते हैं..?
पौराणिक कथा –  शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव एक बार ब्रह्मांड का गमन करते हुए एक जंगल में पहुंचे जहां कई ऋषि-मुनियों रहते थे. भगवान शिव इस जंगल से निर्वस्त्र जा रहे थे. शिवजी के सुडौल शरीर को देख ऋषि-मुनियों की पत्नियां उनकी ओर आकर्षित होने लगी. ऋषियों ने तब शिवजी के मार्ग में एक बड़ा गड्ढा बना दिया जिस गढ्ढे में वे रास्ते में जाते समय गिर गए, और उस गढ्ढे में एक शेर भी पहले से था ताकि वह शिवजी को मारकर खा जाए. इसके बाद शिवजी ने स्वयं उस शेर को मार डाला और उसकी खाल को पहन गड्ढे से बाहर आ गए. तब से माना जाता है कि भगवान शिव शेर की खाल धारण करते हैं. इस पौराणिक कहानी को आधार मानते हुए यह बताया जाता है कि इसलिए शिवजी शेर की खाल पहनते हैं. इसी कथा के आधार पर इस बात का पता लगाया जा सकता है कि आखिर किस कारण से भगवान शिव ने शेर की खाल को अपना वस्त्र बनाया.

ये बातें भी होती हैं जरुरी, सिर्फ भूखा रहने से ही पूरा नहीं होता रोज़ा जानिए…

जैसा कि आप जानते हैं रमजान का पवित्र महीना शुरू हो चुका है और पहला आज यानि 7 मई को है. यह बहुत ही पाक महीना होता है जिसमे. लोगों को इस महीने में अल्लाह के करीब जाने का मौका मिलता है. यह महीना हर मुसलमान के लिए बहुत मायने रखता है. ये इस्लामिक कैलेंडर का नौवां महीना होता है. इस्लाम धर्म के लोगों का मानना है कि रमजान के महीने में जन्नत यानी स्वर्ग के दरवाजें खुल जाते हैं और इस पवित्र महीने में हर दुआ पूरी होती है. इसमें सिर्फ रोज़ा रखना ही सब कुछ नहीं होता बल्कि बहुत सी बातों का ध्यान देना पड़ता है.
रमजान 1 महीने नहीं बल्कि पूरे साल तक रहें. जानकारी दे दें, इस्लाम में 7 सात साल की उम्र के बाद से हर एक इंसान के लिए रोजा रखना जरूरी माना जाता है. वहीं 7 साल की उम्र से छोटे बच्चों, प्रेग्नेंट महिलाओं, बीमार और सफर करने वाले लोगों को रोजा रखने की छूट दी गई है. इसी के साथ आपको बता दें, कि हर बार रमजान के महीने में कई लोगों के मन ये सवाल जरूर आता है कि आखिर रोजा किन चीजों से टूटता है और किन चीजों से नहीं.
अगर आपको भी ये समस्या है तो आपको इसे उत्तर दे दें, पहले बता दें, रोजा रखने का मतलब सिर्फ भूखा प्यासा रहना ही होता है. रोजे का मतलब सिर्फ खाने पीने की चीजों से दूरी बनाना नहीं होता है, बल्कि रोजा रखने के बाद इंसान को हर उस काम से दूर रहना पड़ता है, जो इस्लाम धर्म में मना की गई हैं. खाने पीने की चीजों से दूरी बनाने के साथ आंख, नाक, कान, मुंह सभी चीजों का रोजा होता है. इसका मतलब ये है कि रोजा रखने के बाद इंसान ना तो किसी की बुराई कर सकता है और ना ही किसी का दिल दुखा सकता है. इसी से वो पाक बनते हैं. कई लोग रोजा रखने के बाद भूले से कुछ खा-पी लेते हैं और इस डर से वो रोजा तोड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि भूले से खाने के बाद उनका रोजा टूट गया है. लेकिन ऐसा नहीं है. रोजे के दौरान अगर कोई इंसान अनजाने में कुछ खा-पी लेता है, तो इससे रोजा नहीं टूटता है. इस्लामिक धर्म गुरु का मानना है कि अगर गलती से रोजा रखकर आप कुछ खा-पी लेते हैं तो आपको अपना रोजा पूरा करना चाहिए.

परशुराम ने अपनी मां के साथ किया था ऐसा काम, आपके होश सुनकर उड़ जाएंगे…

जिस दिन अक्षय तृतीया होती है उसी दिन परशुराम जयंती भी मनाई जाती है. ऐसे में परशुराम अपने पिता जमदग्नि के परम भक्त थे और वह उन्हें परमात्मा मानकर उनका सम्मान किया करते थे. ऐसे में आप सभी जानते ही होंगे कि जमदाग्नि बहुत बड़े योगी थे और उन्होंने योग से सिद्धियां प्राप्त की थीं.
काट दिया था माँ का मस्तक – जी हाँ, वहीं सवेरे का समय था, जमदाग्नि की पूजा का समय हो गया था. परशुराम की मां रेणुका जमदग्नि के स्नान के लिए जल लाने के लिए सरोवर पर गईं. संयोग की बात, उस समय एक यक्ष सरोवर में कुछ यक्षणियों के साथ जल-विहार कर रहा था. रेणुका सरोवर के तट पर खड़ी होकर यक्ष के जल-विहार को देखने लगीं. वे उसके जल विहार को देखने में इस प्रकार तन्मय हो गईं कि ये बात भूल गईं, कि उसके पति के नहाने का समय हो गया है और उन्हें शीघ्र जल लेकर जाना चाहिए. कुछ देर के पश्चात रेणुका को अपने कर्तव्य का बोध हुआ. वे घड़े में जल लेकर आश्रम में गईं.घड़े को रखकर जमदग्नि से क्षमा मांगने लगीं.
जमदग्नि ने अपनी योग दृष्टि से ये बात जान ली कि रेणुका को जल लेकर आने में देर क्यों हुईं. जमदाग्नि क्रोधित हो उठे. उन्होंने अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि रेणुका का सिर काटकर धरती पर फेंक दें. किंतु परशुराम को छोड़कर किसी ने भी उनकी आज्ञा का पालन नहीं किया. परशुराम ने पिता की आज्ञानुसार अपनी मां का मस्तक तो काट ही दिया, अपने भाइयों का भी मस्तक काट दिया. जमदग्नि परशुराम के आज्ञापालन से उन पर बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने उनसे वर मांगने को कहा. परशुराम ने निवेदन किया, पितृश्रेष्ठ, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरी मां और मेरे भाइयों को जीवित कर दें. परशुराम की मां और उनके भाई पुन: जीवित हो गए.

जब लालची आदमी ने नहीं पिलाया था सिख धर्म के संस्थापक को पानी जानिए क्या हुआ…

आप सभी को बता दें कि सिख धर्म के संस्थापक गुरुनानक देव थे. उन्होंने सिख धर्म से जुड़े करोड़ों लोगों के लिए खूब काम किया था. ऐसे में गुरु नानक से जुड़ी कई कहानियां हैं जो बहुत ज्यादा रोचक और मानवता के संदेश से भरपूर हैं. तो आइए जानते हैं गुरु नानक की ऐसी कहानी जो आपको बहुत अच्छी लगेगी.
जब लालची आदमी ने नहीं पिलाया गुरु नानक देव जी को पानी – गुरु नानक देव जी अपने शिष्यों के साथ यात्रा किया करते थे. एक बार गांव के तरफ से गुजरते हुए उन्हें अचानक प्यास लगी. चलते-चलते उनको पहाड़ी पर एक कुआं दिखाई दिया. गुरु नानक ने शिष्य को पानी लेने के लिए भेजा. लेकिन कुएं का मालिक लालची और धनी था. वो पानी के बदले धन लिया करता था. शिष्य उस लालची आदमी के पास तीन बार पानी मांगने गया और तीनों बार उसे भगा दिया गया क्योंकि उसके पास धन नहीं था.भीषण गर्मी में गुरु नानक और शिष्य अभी तक प्यासे थे. गुरु जी ने कहा- ‘ईश्वर हमारी मदद जरूर करेगा.’इसके बाद नानक जी ने मिट्टी खोदना शुरू कर दिया.
थोड़ा ही खोदा था और अचानक वहां से शुद्ध पानी आने लगा. जिसके बाद गुरु जी और शिष्यों ने पानी पीकर प्यास बुझाई. गांव वाले भी देखकर वहां पानी पीने पहुंच गए. यह देखकर कुएं के मालिक को गुस्‍सा आ गया. उसने कुएं की तरफ देखा तो वो हैरान रह गया. एक तरफ पानी की धारा बह रही थी तो दूसरी तरफ कुएं का पानी कम होता जा रहा था. फिर कुएं के मालिक ने गुरु जी को जोर से पत्थर मारा. लेकिन गुरु जी ने हाथ आगे किया और पत्थर हाथ से टकराकर वहीं रुक गया. ऐसा देख कुएं का मालिक उनके चरणों पर आकर गिर गया. गुरु जी ने समझाया- “किस बात का घमंड? तुम्हारा कुछ नहीं है. खाली हाथ आए थे खाली हाथ जाओगे. कुछ करके जाओगे तो लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहोगे.”

युधिष्ठिर, इस घटना के बाद हमेशा सच बोलते थे…

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पुराणों में ऐसी कई कहानी और कथाएं हैं जिन्हे सुनकर आप सभी हैरान हो सकते हैं. ऐसे में आज हम एक ऐसी ही कथा आपको बताने जा रहे हैं जिसे आपने पहले कभी नहीं सुना होगा. जी हाँ, यह कथा युधिष्ठिर और उनके गुरु से जुडी है. आइए जानते हैं.

कथा – गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों को शास्त्रों से लेकर शस्त्रों तक की शिक्षा देते थे. उनकी कोशिश रहती थी कि उनके विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास हो. एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों को पाठ पढ़ाया- ‘सत्यं-वद्’. इस मंत्र का अनेक बार उच्चारण करवाया, फिर शिष्यों से कहा इसे कल अच्छी तरह याद करके आना. सभी विद्यार्थी उन चार अक्षर वाले मंत्र को दूसरे दिन याद करके पहुंचे! लेकिन कक्षा में युधिष्ठिर ने खड़े होकर कहा- ‘गुरुदेव मुझे अभी यह पाठ याद नहीं हुआ.’
गुरुजी ने कहा- ‘ठीक है, कोई बात नहीं कल याद कर लाना’. अब गुरुजी ने अन्य विद्यार्थियों को अन्य पाठ पढ़ा दिया. दूसरे दिन जब गुरुजी ने युधिष्ठिर से पाठ सुनाने के लिए बोला, तब भी युधिष्ठिर ने कहा- ‘याद नहीं हुआ’.इस प्रकार कई दिन तक युधिष्ठिर यही कहते रहे कि ये मंत्र बड़ा कठिन है, सही प्रकार से याद ही नहीं हो पा रहा है. दो सप्ताह बाद गुरुजी युधिष्ठिर को डांटते हुए बोले, ‘इतने दिन हो गए, चार अक्षर याद नहीं होते’? युधिष्ठिर बोले- ‘लिखने और पढ़ने की दृष्टि से यह मंत्र बहुत छोटा है. कुछ पल में याद हो सकता है, पर इससे क्या होगा? जब तक इस मंत्र का अर्थ और भाव व्यवहार में न आ जाय, तब तब उसका याद करना बेकार है. मैं ‘सत्यं वद्- ‘सत्य बोलो’ की शिक्षा को अपने व्यवहार में उतारने की कोशिश कर रहा हूं. अभी पुरानी अनावश्यक झूठ बोलने की आदत के कारण सत्य बोलने का पाठ पक्का नहीं हो पा रहा है, इसलिए इतने दिन लग रहे हैं. जब यह पाठ मेरे आचरण में पक्का हो जाएगा, मैं तब मानूंगा यह मुझे याद हो गया है.’
युधिष्ठिर की ऐसी सच्ची बातें सुनकर गुरु द्रोणाचार्य बड़े प्रसन्न हुए. युधिष्ठिर ने ‘सत्यं वद्’ के पाठ को जीवन में ऐसा पक्का किया कि वो सत्यवादी बन गए और जीवन भर उसको निभाते रहे. हम शास्त्रों को तो पूजते हैं, लेकिन शास्त्रों में लिखी बात नहीं मानते. शास्त्रों के प्रति सच्ची श्रद्धा यही है कि शास्त्र में लिखी बातों को जीवन का हिस्सा बनाए, जिससे हमारा जीवन निखरेगा और सर्वांगीण विकास होगा.

Friday, May 17, 2019

ये पौराणिक कथा जो बताती है समुद्र के खारे पानी का रहस्य…


ये पौराणिक कथा जो बताती है समुद्र के खारे पानी का रहस्य...

क्या आपने कभी सोचा है की समुद्र का पानी खारा क्यों होता है? जबकि शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान् विष्णु जिस सागर में निवास करते है वह मीठे पानी व दूध से निर्मित सागर है जिसे क्षीरसागर के नाम से जाना जाता है. लेकिन हकीकत में देखा जाए तो इस पृथ्वी पर जितने भी समुद्र है सभी का पानी खारा है. क्या आप जानते है समुद्र के इस खारे पानी के होने का क्या कारण है पौराणिक मान्यता है की महाराजा पृथु के पुत्रों ने जिस सात समुद्र का निर्माण किया था वह सभी मीठे पानी व दूध की भांति थे. समुद्र के पानी का खारा होने के पीछे एक पौराणिक रहस्य है आइये जानते है.

पौराणिक कथा – इस कथा के अनुसार जब माता पार्वती भगवान् शिव को पति के रूप में पाने के लिए घोर तपस्या कर रही थी तो उनकी तपस्या के प्रभाव से तीनों लोक कांपने लगे. जिससे भयभीत होकर सभी देवता एकत्र होकर इस विषय में विचार विमर्श करने लगे. किन्तु समुद्र देव माता पार्वती की सुन्दरता पर मोहित हो चुके थे जिसके वशीभूत होकर उन्होंने अपने विचार सभी देवताओं के समक्ष रखे और भगवान् शिव के विषय में भला-बुरा कहने लगे. समुद्र देव की इस बात के लिए भगवान शिव व सभी देवताओं में क्षमा कर दिया. जिसके कारण समुद्रदेव का अहंकार और अधिक बढ़ गया और वह माता पार्वती के समक्ष उपस्थित हो गए और उनके समक्ष विवाह प्रस्ताव रखा पर माता पार्वती ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.
जिससे समुद्रदेव को बहुत क्रोध आया और अपने अहंकार के वशीभूत होकर उन्होंने भगवान् शिव के विषय में माता पार्वती से खूब भला-बुरा कहा व भगवान् शिव को श्मशान निवासी, अघोरी, भस्मधारी आदि नामों से संबोधित कर माता पार्वती से अपने निर्णय को बदलने के लिए कहा. और कहा की उसका समुद्र मीठे पानी व दूध से भरपूर है जिसकी वजह से वह माता पार्वती को पत्नी बनाने का आधिकारी है. समुद्रदेव के कथनों को सुनकर माता पार्वती को बहुत क्रोध आया और उन्होंने समुद्रदेव को श्राप दिया कि उसे जिस मीठे व दूध जैसे पानी पर अभिमान है वह जल खारा हो जाए और किसी के पीने योग्य न रहे. इसी वजह से सभी समुद्रों का पानी खारा होता है.

भगवान श्रीकृष्ण की माखनचोरी लीला

ब्रज घर-घर प्रगटी यह बात। दधि माखन चोरी करि लै हरि, ग्वाल सखा सँग खात।। ब्रज-बनिता यह सुनि मन हरषित, सदन हमारैं आवैं। माखन खात अचानक...