google-site-verification=NjzZlC7Fcg_KTCBLvYTlWhHm_miKusof8uIwdUbvX_U पौराणिक कथा

Friday, May 24, 2019

अग्नि पुराण

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अग्नि पुराण’ समस्त महापुराणों की सूची में आठवें स्थान पर है, जिसने अपने साहित्य एवं ज्ञान भंडार के

 कारण विशेष पद प्राप्त किया है। अग्नि पुराण को 'भारतीय संस्कृति का विश्वकोश' भी कहा जाता है। अग्नि 

पुराण में त्रिदेवों यानि ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं सूर्यदेव की उपासना का विवरण विस्तारपूर्वक किया गया है। 

अग्नि पुराण में समस्त विद्याओं का वर्णन, महाभारत एवं रामायण का अल्प विवरण है, इसके अलावा 

भगवान विष्णु के मत्स्य, कूर्म व अन्य अवतारों की कथा, सृष्टि, विविध देवी देवताओं के मन्त्र, पूजन विधि, व 

अन्य अनेक उपयोगी विषयों को अत्यन्त सहज रूप में संकलित है।

अग्नि पुराण के भाग (Parts of Agni Puran)
नारद पुराण के अनुसार अग्नि पुराण में तीन सौ तैरासी अध्याय तथा लगभग पंद्रह हज़ार श्लोकों का संग्रह है, किन्तु मतस्यपुराण के अनुसार अग्नि पुराण में सोलह हजार श्लोक हैं। अग्नि पुराण दो भागों में विभाजित है, जो निम्न हैं:
· प्रथम भाग: अग्नि पुराण के प्रथम भाग में ब्रह्म विद्या, भगवान विष्णु के दस अवतारों के साथ साथ 11 रुद्रों, 8 वसुओं एवं 12 आदित्यों का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त भगवान विष्णु, शिव व सूर्य की अर्चना का विधान है। भौगोलिक, राजनैतिक, गणित, ज्योतिष शास्त्र व अन्य विद्या विस्तारपूर्वक उल्लेख है।
· द्वितीय भाग: द्वितीय भाग में धन्वंतरि देवी (आयुर्वेद) का विशेष विवरण अनेक अध्यायों में उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त छंद, अलंकार, व्याकरण एवं कोश शस्त्र संबंधी कई विवरण दिये गए हैं।  
अग्नि पुराण का फल (Benefits of Agni Puran)
मान्यता है कि जो मनुष्य अग्नि पुराण को लिखकर स्वर्णमयी कमल और तिलमयी धेनु के साथ मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को पौराणिक ब्राह्मण को दान करता है, वह स्वर्ग लोक में प्रतिष्ठित होता है। अग्नि पुराण की पढ़ने व सुनने से मनुष्य को इहलोक एवं परलोक में भी मोक्ष प्राप्त होता है।

गीता

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हिन्दू धर्म में गीता को बेहद पवित्र ग्रंथ माना जाता है। महाभारत काल में रचे गए इस ग्रंथ को जीवन का सार समझा जाता है। गीता में कुल अठारह अध्याय तथा सात सौ से ज्यादा श्लोक हैं। गीता पूर्णतः अर्जुन और उनके सारथी श्रीकृष्ण के बीच हुए संवाद पर आधारित पुस्तक है।
गीता में ज्ञानयोग, कर्म योग, भक्ति योग, राजयोग, एकेश्वरवाद आदि की बहुत सुन्दर ढंग से चर्चा की गई है। इसमें आत्मा के देह त्यागने, मोक्ष प्राप्त करने तथा दूसरा शरीर धारण करने की प्रक्रिया का पूर्ण वर्णन किया गया है। आज के संदर्भ में अगर बात करें तो गीता मनुष्य को कर्म का महत्त्व समझाती है। गीता में श्रेष्ठ मानव जीवन का सार बताया गया है।  
कब और किसने की गीता की रचना( When and Who Write the Bhagwat Gita)
हिन्दू ग्रंथ महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं और गीता महाभारत का ही एक हिस्सा है। माना जाता है कि चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में गीता की रचना की गई थी हालांकि इसका कोई प्रमाण नहीं है। 
क्यों जरूरत पड़ी गीता की? (About gita in hindi)
कौरव और पांडवों के बीच हो रहे धर्म युद्ध में जब अर्जुन अपने सगे-संबंधियों को अपने खिलाफ युद्ध भूमि में देख विचलित हो उठे तब भगवान कृष्ण ने उन्हें गीता का उपदेश देकर कर्म के महत्त्व को समझाया। गीता के 18 पाठ में संजय कुरुक्षेत्र में हो रही घटनाओं का वर्णन कर धृतराष्ट्र को बताते हैं। जिसमें भयभीत और भटके हुए अर्जुन का श्रीकृष्ण ज्ञान द्वार मार्गदर्शन करते है। गीता केवल अर्जुन के लिए ही नहीं बल्कि प्रत्येक मानव के लिए प्रासंगिक है। 

गीता के मुख्य पात्र (Main characters of Gita in Hindi)
गीता के मुख्य पात्र अर्जुन, सारथी और गुरु के रूप में श्रीकृष्ण, धृतराष्ट्र के सलाहकार के रूप में संजय तथा कुरु के राजा धृतराष्ट्र हैं। पूरी गीता में यही चार पात्र आपस में बात करते हैं।

गीता का आधार - संवाद (Gita based on Dialogue in Hindi)
गीता में कुरुक्षेत्र युद्ध के आरंभ की स्थिति का वर्णन किया गया है। यह पूर्णतः संजय और राजा धृतराष्ट्र के बीच हुए संवाद पर आधारित है।

गीता ध्यानम् (Introduction of Gita in Hindi)
गीता ध्यानम् भगवत् गीता का भाग नहीं है। परंतु इसे गीता में एक उपसर्ग के रूप में देखा जाता है। इसमें कुल 9 श्लोक हैं जिसे गीता का पाठ शुरू करने से पहले पढ़ा जाता हैं। इन श्लोकों में गीता की उपयोगिता के विषय में बताया गया है।

गीता के 18 अध्याय (18 Chapters of gita in hindi)
पहला पाठ- गीता का पहला अध्याय अर्जुन-विषाद योग है। इसमें 46 श्लोकों द्वारा अर्जुन की मनःस्थिति का वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि किस तरह अर्जुन अपने सगे-संबंधियों से युद्ध करने से डरते हैं और किस तरह भगवान कृष्ण उन्हें समझाते हैं?
दूसरा पाठ- गीता के दूसरे अध्याय "सांख्य-योग" में कुल 72 श्लोक हैं। जिसमें श्रीकृष्ण, अर्जुन को कर्मयोग, ज्ञानयोग, संख्ययोग, बुद्धि योग और आत्म का ज्ञान देते हैं। यह अध्याय वास्तव में पूरी गीता का सारांश है। इसे बेहद महत्त्वपूर्ण भाग माना जाता है।
तीसरा पाठ- गीता का तीसरा अध्याय कर्मयोग है, इसमें 43 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि परिणाम की चिंता किए बिना हमें हमारा कर्म करते रहना चाहिए।
चौथा पाठ- ज्ञानकर्म संन्यास योग गीता का चौथा अध्याय है, जिसमें 42 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण, अर्जुन को बताते हैं कि धर्मपरायण के संरक्षण और अधर्मी के विनाश के लिए गुरु का अत्यधिक महत्त्व होता है।
पांचवा पाठ- कर्म संन्यास योग गीता का पांचवां अध्याय है, जिसमें 29 श्लोक हैं। इसमें अर्जुन, श्रीकृष्ण से पूछते है कि कर्मयोग और ज्ञान योग दोने में से उनके लिए कौन-सा उत्तम है। तब श्रीकृष्ण कहते है कि दोनों का लक्ष्य एक है, परंतु कर्म योग अभिनय के लिए बेहतर है।
छठा पाठ- आत्मसंयम योग गीता का छठा अध्याय है, जिसमें 47 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण, अर्जुन को अष्टांग योग के बारे में बताते हैं। वह बताते है कि किस प्रकार मन की दुविधा को दूर कर महारथ प्राप्त किया जा सकता हैं।
सातवाँ पाठ- ज्ञानविज्ञान योग गीता का सातवां अध्याय है, जिसमें 30 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण निरपेक्ष वास्तविकता और उसके भ्रामक ऊर्जा “माया” के बारे में अर्जुन को बताते हैं।
आठवाँ पाठ- गीता का आठवां अध्याय अक्षरब्रह्मयोग है, जिसमें 28 श्लोक हैं। गीता के इस पाठ में स्वर्ग और नरक का सिद्धांत शामिल है। इसमें मृत्यु से पहले व्यक्ति की सोच, अध्यात्मिक संसार तथा नरक और स्वर्ग जाने की राह के बारे में बताया गया है।
नौवां पाठ- राजविद्याराजगुह्य योग गीता का नवां अध्याय है, जिसमें 34 श्लोक हैं। इसे श्रीकृष्ण की आंतरिक ऊर्जा सृष्टि को व्याप्त बनाता है, उसका सृजन करता है और पूरे ब्रह्मांड को नष्ट कर देता है, यह बताया गया है।
दसवाँ पाठ- विभूति योग गीता का दसवां अध्याय है जिसमें 42 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बताते हैं कि किस प्रकार सभी तत्त्वों और आध्यात्मिक अस्तित्व के अंत का कारण बनते हैं।
ग्यारहवाँ पाठ- विश्वरूपदर्शन योग गीता का ग्यारहवां अध्याय है जिसमें 55 श्लोक है। इस अध्याय में अर्जुन के निवेदन पर श्रीकृष्ण अपना विश्वरुप धारण करते हैं।
बारहवाँ पाठ- भक्ति योग गीता का बारहवां अध्याय है जिसमें 20 श्लोक हैं। इस अध्याय में कृष्ण भगवान भक्ति के मार्ग की महिमा अर्जुन को बताते हैं। इसके साथ ही वह भक्तियोग का वर्णन अर्जुन को सुनाते हैं।
तेरहवाँ पाठ- क्षेत्रक्षत्रज्ञविभाग योग गीता तेरहवां अध्याय है इसमें 35 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' के ज्ञान के बारे में तथा सत्त्व, रज और तम गुणों द्वारा अच्छी योनि में जन्म लेने का उपाय बताते हैं।
चौदहवाँ पाठ- गीता का चौदहवां अध्याय गुणत्रयविभाग योग है इसमें 27 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण सत्त्व, रज और तम गुणों का तथा मनुष्य की उत्तम, मध्यम अन्य गतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं। अंत में इन गुणों को पाने का उपाय और इसका फल बताया गया है।
पंद्रहवाँ पाठ- गीता का पंद्रहवां अध्याय पुरुषोत्तम योग है, इसमें 20 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण कहते हैं कि दैवी प्रकृति वाले ज्ञानी पुरुष सर्व प्रकार से मेरा भजन करते हैं तथा आसुरी प्रकृति वाला अज्ञानी पुरुष मेरा उपहास करते हैं।
सोलहवाँ पाठ- दैवासुरसंपद्विभाग योग गीता का सोलहवां अध्याय है, इसमें 24 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण स्वाभाविक रीति से ही दैवी प्रकृति वाले ज्ञानी पुरुष तथा आसुरी प्रकृति वाले अज्ञानी पुरुष के लक्षण के बारे में बताते हैं।
सत्रहवाँ पाठ- श्रद्धात्रयविभाग योग गीता का सत्रहवां अध्याय है, इसमें 28 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बताते हैं कि जो शास्त्र विधि का ज्ञान न होने से तथा अन्य कारणों से शास्त्र विधि छोड़ने पर भी यज्ञ, पूजा आदि शुभ कर्म तो श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनकी स्थिति क्या होती है।
अठारहवाँ पाठ- मोक्ष-संन्यास योग गीता का अठारहवाँ अध्याय है, इसमें 78 श्लोक हैं। यह अध्याय पिछले सभी अध्यायों का सारांश है। इसमें अर्जुन, श्रीकृष्ण से न्यास यानि ज्ञानयोग का और त्याग यानि फलासक्तिरहित कर्मयोग का तत्त्व जानने की इच्छा प्रकट करते हैं।

श्रीमद्भागवत पुराण

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श्रीमद्भागवत’ पुराण वैष्णव समुदाय का प्रमुख ग्रन्थ है। भगवान विष्णु से संबंधित श्रीमद्भागवत पुराण में वेदों, उपनिषदों व दर्शन शास्त्र की व्याख्या विस्तारपूर्वक की गई है। श्रीमद्भागवत पुराण को सनातन धर्म तथा संस्कृति का विश्वकोष भी कहा जाता है। श्रीमद्भागवत पुराण में बारह वैष्णव स्कंध, तीन सौ पैंतीस अध्याय एवं अठारह हज़ार श्लोक हैं। हिन्दू धर्म को समझने के लिए इस पुराण को बेहद अहम माना जाता है।



श्रीमद्भागवत पुराण के भाग (Chapters of Shreemadbhagvat Puran)
श्रीमद्भागवत पुराण, पुराणों की सूची में पांचवें स्थान पर हैं। श्रीमद्भागवत पुराण में भगवान विष्णु के अवतारों का सुंदर वर्णन किया गया है। श्रीमद्भागवत बारह स्कन्धों में विभाजित है, जो निम्न हैं:

1. ‘श्रीमद्भागवत’ के प्रथम स्कन्ध में भक्तियोग तथा वैराग्य का वर्णन किया गया है। इस महापुराण के उनतीस अध्याय हैं, जिनमें ईश्वर-भक्ति को शुकदेव द्वारा सुनाया गया है।
2. द्वितीय स्कन्ध में प्रभु के विराट स्वरूप, देवताओं की उपासना, गीता का सार, 'कृष्णार्पणमस्तु' व काल विभाजन की विवेचना की गई है।
3. तृतीय स्कन्ध उद्धव तथा विदुर की कथा के साथ प्रारम्भ होता है, तथा भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मा का जन्म, सृष्टि का विस्तार व अन्य की विस्तारपूर्वक विवेचना की गई है।
4. चतुर्थ स्कन्ध में ‘पुरंजनोपाख्यान' अत्यधिक प्रसिद्ध है, जिसमें राजा पुरंजक व भारत की एक सुंदरी की कथा का वर्णन मिलता है। साथ ही राजर्षि ध्रुव तथा पृथु के चरित्र का भी उल्लेख मिलता है।
5. पंचम स्कन्ध में अग्नीध्र, राजा नाभि, ऋषभदेव तथा भरत के साथ-साथ समुद्र, नदी, पर्वत, पाताल व नरक का वर्णन है।
6. षष्ठ स्कन्ध में अजामिल (नारायण के पिता) की व्याख्या, नारायण कवच और पुंसवन व्रत विधि व दक्ष प्रजापति के वंश का वर्णन है, जो मनुष्य, पशु एवं देवताओं के जन्म कथा का बखान करता है।
7. सप्तम स्कन्ध में प्रह्लाद व हिरण्यकश्यिपु के साथ वर्ण, वर्ग तथा धर्म का विवरण दिया गया है।
8. अष्टम स्कन्ध में भगवान विष्णु व गजेंद्र की रोचक कथा का सार मिलता है। इससे अतिरिक्त समुद्र मंथन, वामन अवतार, देव-असुर संग्राम का वर्णन इसी स्कन्ध में दिया गया है।
9. नवां स्कन्ध में भगवान राम व सीता का विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया गया है, साथ ही राजवंशों के चरित्र को भी दर्शाया गया है।
10. दशम स्कन्ध में भगवान कृष्ण की अनंत लीलाओं का वर्णन किया गया है।
11. एकादश स्कन्ध में राजा जनक व 9 योगियों के संवादों का वर्णन मिलता है। साथ ही इसी स्कन्ध में यदु वंश के संहार का विश्लेषण किया गया है।
12. द्वादश स्कन्ध में भविष्यकाल के आधार पर राजा परीक्षित व राजवंशों का वर्णन किया गया है। साथ ही विभिन्न कालों, प्रलयों व भगवानों के उपांगों का स्वरूप दर्शाया गया है।
श्रीमद्भागवत पुराण का फल (Benefits of Shreemadbhagvat Puran)
श्रीमद्भागवत का सम्पादन वेदव्यास जी द्वारा किया गया है। माना जाता है कि इस पुराण के श्रवण से मनुष्य के समस्त पापों का नाश होता है। जो मनुष्य श्रीमद्भागवत पुराण का पाठ सुनता या सुनाता है वह समस्त पुराण के श्रवण का उत्तम फल प्राप्त करता है।


स्त्री आदरणीय है

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हिन्दू धर्म में स्त्री को आदरणीय माना जाता है। वेदों और पुराणों में आदि शक्ति को एक नारी का ही रूप माना गया है। मान्यता है कि त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी अपनी शक्तियां इन्हीं देवी से पाते हैं। हिन्दू धर्म दर्शन में नारी के अस्तित्व और उसके महत्व को बेहद विस्तार से समझाया गया है। लेकिन वक्त के साथ हिन्दू धर्म के पाखंडियों और अल्पज्ञानियों ने नारी के अस्तित्व को नहीं समझा। नारी के महत्व को हिन्दू धर्म के प्रमुख तत्वों में शामिल किया गया है। 

क्या है नारी का महत्व (Importance on Women in Hinduism)
यत्र   नार्यस्तु   पूज्यन्ते रमन्ते  तत्र  देवता: ।
यत्रैतास्तु  न  पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया: । 
यानि जहां नारी की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है। और जहां इनकी पूजा नहीं होती वहां सभी काम निष्फल हो जाते हैं। 

हिन्दू धर्म में कहा गया है कि जहां नारी की पूजा होती है वहां शक्ति का वास होता है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड शक्ति के बिना अधूरा है। इसलिए नारी की पूजा होनी ही चाहिए। त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी जब किसी कार्य को सिद्ध नहीं कर पाते तो वह आदि शक्ति का ही ध्यान करते हैं। महिषासुर की कथा से यह सिद्ध होता है कि जिस परम शक्ति और सबसे बड़ी व्यवस्था का जिक्र किया गया है वह देवी भगवती यानि नारी के बेहद करीब या खुद भगवती दुर्गा ही हैं। (हिन्दू धर्म में एक परमेश्वर को सबसे बड़ा माना गया है जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव से भी उच्च स्थान पर हैं)
नारी की पूजा (Worship of Women)
हिन्दू धर्म में नारी की पूजा का विधान है। नवरात्र के दौरान कन्या पूजन के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। तीर्थ स्थान या किसी पूजा आदि में बिना पत्नी के बैठना पाप समान माना गया है। 

नारी कल्याण के लिए तत्पर हिन्दू धर्म 
हिन्दू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी यानि आधा अंग माना गया है। हिंदू धर्म के त्रिदेवों को भी उनकी पत्नियों के बिना अधूरा माना गया है जैसे विष्णु जी और लक्ष्मी जी, शिवजी और पार्वती जी, ब्रह्मा जी और सरस्वती जी। ऐसी व्यवस्था को लागू कर आम लोगों के दिलों में नारी के प्रति श्रद्धा भाव को जगाए रखने का प्रयास किया गया है। 
बाद के वर्षों में अज्ञानी और पाखंडियों के कारण नारी के महत्व को अवश्य ठेस पहुंची है। कुछ बेबुनियादी प्रथाएं शुरू की गई जिनका वैदिक सनातन धर्म से कोई नाता नहीं है जैसे सती प्रथा, बाल विवाह, दहेज आदि। सती होने की कहानी हिन्दू धर्म ग्रंथों में कहीं नहीं मिलती। बाल विवाह का भी हिन्दू धर्म ग्रंथों में कोई जिक्र नहीं है।

हिन्दू धर्म ग्रंथों में शिव-पार्वती और राम-सीता की कथाएं मिलती हैं जिनमें दहेज का कोई जिक्र नहीं है। हिन्दू सनातन धर्म में तो स्त्रियों के स्वयंवर की कथाएं है यानि पहले स्त्रियां अपने लिए वर खुद पसंद कर सकती थी। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि हिन्दू सनातन धर्म में महिलाओं को सदा आदरणीय माना है लेकिन बाद के वर्षों में पाखंडियों ने स्त्री के महत्व को कमजोर करने में बड़ी भूमिका निभाई। 

आत्मा अजर-अमर है

आत्मा अजर-अमर है
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हिंदू धर्म में मृत्यु को सबसे बड़ा सत्य माना गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार जिस जीव ने इस संसार में जन्म लिया है उसे मरना ही है लेकिन साथ ही हिंदू धर्म में आत्मा को अजर-अमर माना गया है। दरअसल इसके लिए हिंदू धर्म के उस दर्शन या तत्व को समझना जरूरी है जो आत्मा पर आधारित है।
आत्मा क्या है? (What is Atma)
हिंदू सनातन धर्म के अनुसार मनुष्य हर जन्म में एक नया शरीर लेकर तो जन्म लेता है लेकिन उसकी आत्मा नई नहीं होती। आत्मा अपने पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार नया जन्म और नए शरीर को धारण करती है। आत्मा कपड़ों की तरह शरीर बदल-बदल कर पृथ्वी लोक यानि कर्म लोक में आती है। आत्मा को बार-बार इस धरती पर अपने कर्म चक्र को पूरा करने के लिए ही जन्म लेना पड़ता है और यह यात्रा मोक्ष के बाद ही समाप्त होती है। मोक्ष यानि मुक्ति, यहां मुक्ति का अर्थ कर्मों की मुक्ति से है। यही कारण है कि हिन्दू धर्म में मोक्ष को सबसे बड़ा लक्ष्य माना गया है। मोक्ष की प्राप्ति के बाद ही आत्मा का यात्रा चक्र समाप्त होता है। 
हिंदू धर्म के सबसे बड़े दर्शन शास्त्र ”गीता” में कहा गया है कि 
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय   नवानि  गृह्णाति नरो पराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-  न्यन्यानि  संयाति नवानि देही ।
 
उपरोक्त पंक्तियों का सार है कि जिस तरह वस्त्र गंदे होने पर इंसान नए वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार आत्मा भी नित नए शरीर धारण कर लेती है। 

आत्मा की स्थिति 
 
नैनं  छिन्दन्ति  शस्त्राणि  नैनं दहति पावक: ।
न  चैनं  क्लेदयन्तापो  न  शोषयति मारुत: ।
भावार्थ : आत्मा वो है जिसे किसी भी शस्त्र से भेदा नहीं जा सकता, जिसे कोई भी आग जला नहीं सकती, कोई भी दुख उसे तपा नहीं सकता और न ही कोई वायु उसे बहा सकती है।  
गीता के उपरोक्त श्लोक से आत्मा की स्थिति का पूर्ण ज्ञान हो जाता है। आत्मा कभी मरती या खत्म नहीं होती है यह तो केवल एक प्राणी से दूसरे प्राणी में चली जाती है, हर बार नए शरीर के साथ पृथ्वी यानि कर्मलोक में आती है। जब तक आत्मा का कार्य पूर्ण नहीं हो जाता, उसके किए हुए पुण्य और पाप एक समान नहीं हो जाते उसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। 
 
आत्मा के इसी चक्र के कारण हिन्दू धर्म में कई जगह पुनर्जन्म की बात कही गई है। पुनर्जन्म की धारणा को आत्मा के यात्रा चक्र के कारण बल मिलता है। आत्मा के बार-बार शरीर बदलने के कारण ही हिन्दू धर्म के मुख्य सिद्धांतों में पुनर्जन्म को शामिल किया गया है। 



Tuesday, May 21, 2019

क्यों बैठती है लक्ष्मी जी विष्णु भगवन के चरणों में

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हम आपके समक्ष एक ऐसी भगवान की कहानी लेकर आये है जो पूरी दुनिया को एक बहुत ही अच्छा सन्देश देती है और साथ ही कई लोगों की दुविधा दूर करेगी. कई लोग खासकर युवा पीढ़ी ये प्रश्न पूछते है कि ज़्यादातर तस्वीरो में लक्ष्मी माता को विष्णु भगवान के चरणों में बिठाया ही क्यों दिखाते है. कुछ लोगों को लगता है चूँकि एक प्रेमिका या पत्नी का स्थान तो सर्वपरि और दिल में होना चाहिए तो फिर क्यों ज़्यादातर तस्वीरो में लक्ष्मी माँ को विष्णु भगवन के चरणों की दासी की तरफ प्रदर्शित किया जाता है.

हम इसका उत्तर अवश्य देंगे और इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए ये विष्णु भगवान की कहानी को अंत तक ज़रूर पढ़े.
भगवान श्री राम का तेज़ और सुंदरता इतनी ज़्यादा थी कि महिलाएं उनकी तरफ आकर्षित हो जाती थी. एक बार माता सीता ने भगवन राम जी को वन में ले जा कर एक पेड़ से बांध दिया क्यूंकि वो अपने राम को किसी दूसरे के साथ बांटना नहीं चाहती थी. ये माता सीता की ईर्ष्या थी लेकिन इसमें सच्चा प्रेम ही था
एक बार भगवान श्री कृष्ण गोपी का रूप धारण कर राधा के पास आये थे. उस वक़्त राधा का पाँव बहुत पीड़ा कर रहा था और श्री कृष्ण जी ने राधा के पैर खुद दबाये थे और राधा का दुःख दूर किया था. क्या श्री कृष्ण की महिमा इससे कम पड़ गयी, बिलकुल नहीं. ये तो सच्चा प्यार था.
भगवान की कहानी
उसी तरह जब जब पारवती माँ ने काली का रूप धारण कर लिया था तो महादेव को ज़मीन पर लेटना पड़ा और जब काली माँ ने महादेव की छाती पर पर अपना पाँव रखा तब ही वे शांत हुई थी. क्या एक पत्नी का अपने पति के साथ ऐसा व्यव्हार करने से उनमे प्यार कम हो गया, जी नहीं, बिलकुल नहीं. वो तो विधि का विधान था. महादेव ने ये इस सृष्टि को बचाने के लिए किया था और इससे उनके प्यार में कोई फर्क नहीं पड़ा.
उसी तरफ भगवन विष्णु जी की पत्नी का अपने पत्नी के चरणों में बैठना भी सच्चा प्रेम है. ये सिर्फ प्रेम नहीं बल्कि माँ लक्ष्मी का इस सृष्टि के प्राणियों को एक सन्देश भी है.

वो सन्देश ये है कि अगर मानव अपने भगवन विष्णु को पाना चाहते है तो उसका एकमात्र मार्ग है उनके चरण. अगर कोई भक्त अपने भगवन का प्यार पाना चाहता है तो उसे अपने आप को पूरी तरह विष्णु जी को अर्पित करना पड़ेगा और उसका मार्ग तो केवल भगवन के चरणों से ही शुरू होता है.
इस सृष्टि के सभी प्राणियों को माता लक्ष्मी यही बताना चाहती है कि चाहे जितना भी धन, वैभव और शौर्य कमा लो, अगर तुम्हारे नाथ तुम्हारे साथ नहीं तो सब व्यर्थ है.
अर्थार्त अपने भगवान् की सेवा अर्चना करने से ही हमें सम्पूर्ण ख़ुशी मिलेगी और इस धरती पर हमारा जीवन सफल होगा.
बोलो लक्ष्मी नारायण की जय !

Saturday, May 18, 2019

सूर्यदेव का रथ – अनेक रहस्यों से भरा है , आइए जानें….

श्रीमदभागवत पुराण में श्री शुकदेव जी के अनुसार:- भूलोक तथा द्युलोक के मध्य में अंतरिक्ष लोक है. इस द्युलोक में सूर्य भगवान नक्षत्र तारों के मध्य में विराजमान रह कर तीनों लोकों को प्रकाशित करते हैं. जी हाँ, वहीं उत्तरायण, दक्षिणायन तथा विषुक्त नामक तीन मार्गों से चलने के कारण कर्क, मकर तथा समान गतियों के छोटे, बड़े तथा समान दिन रात्रि बनाते हैंऔर जब भगवान सूर्य मेष तथा तुला राशि पर रहते हैं तब दिन रात्रि समान रहते हैं. ऐसे में जब वे वृष, मिथुन, कर्क, सिंह और कन्या राशियों में रहते हैं तब क्रमशः रात्रि एक-एक मास में एक-एक घड़ी बढ़ती जाती है और दिन घटते जाते हैं और जब सूर्य वृश्चिक, मकर, कुंभ, मीन और मेष राशि में रहते हैं तब क्रमशः दिन प्रति मास एक-एक घड़ी बढ़ता जाता है तथा रात्रि कम होती जाती है.


“हे राजन्! सूर्य की परिक्रमा का मार्ग मानसोत्तर पर्वत पर इंक्यावन लाख योजन है. मेरु पर्वत के पूर्व की ओर इन्द्रपुरी है, दक्षिण की ओर यमपुरी है, पश्चिम की ओर वरुणपुरी है और उत्तर की ओर चन्द्रपुरी है. मेरु पर्वत के चारों ओर सूर्य परिक्रमा करते हैं इसलिए इन पुरियों में कभी दिन, कभी रात्रि, कभी मध्याह्न और कभी मध्यरात्रि होता है. सूर्य भगवान जिस पुरी में उदय होते हैं उसके ठीक सामने अस्त होते प्रतीत होते हैं. जिस पुरी में मध्याह्न होता है उसके ठीक सामने अर्ध रात्रि होती है. सूर्य भगवान की चाल पन्द्रह घड़ी में सवा सौ करोड़ साढ़े बारह लाख योजन से कुछ अधिक है. उनके साथ-साथ चंद्रमा तथा अन्य नक्षत्र भी घूमते रहते हैं. सूर्य का रथ एक मुहूर्त (दो घड़ी) में चौंतीस लाख आठ सौ योजन चलता है. इस रथ का संवत्सर नाम का एक पहिया है जिसके बारह अरे (मास), छः नेम, छः ऋतु और तीन चौमासे हैं. इस रथ की एक धुरी मानसोत्तर पर्वत पर तथा दूसरा सिरा मेरु पर्वत पर स्थित है. इस रथ में बैठने का स्थान छत्तीस लाख योजन लम्बा है तथा अरुण नाम के सारथी इसे चलाते हैं. हे राजन्! भगवान भुवन भास्कर इस प्रकार नौ करोड़ इक्यावन लाख योजन लंबे परिधि को एक क्षण में दो सहस्त्र योजन के हिसाब से तह करते हैं.”
आपको बता दें कि इस रथ का विस्तार नौ हजार योजन है. इससे दोगुना इसका ईषा-दण्ड (जूआ और रथ के बीच का भाग) है. इसका धुरा डेढ़ करोड़ सात लाख योजन लंबा है, जिसमें पहिया लगा हुआ है. उस पूर्वाह्न, मध्याह्न और पराह्न रूप तीन नाभि, परिवत्सर आदि पांच अरे और षड ऋतु रूप छः नेमि वाले अक्षस्वरूप संवत्सरात्मक चक्र में सम्पूर्ण कालचक्र स्थित है. इसमें सात छंद इसके घोड़े हैं: गायत्री, वृहति, उष्णिक, जगती, त्रिष्टुप, अनुष्टुप और पंक्ति. इस रथ का दूसरा धुरा साढ़े पैंतालीस सहस्र योजन लम्बा है. इसके दोनों जुओं के परिमाण के तुल्य ही इसके युगार्द्धों (जूओं) का परिमाण है. इनमें से छोटा धुरा उस रथ के जूए के सहित ध्रुव के आधार पर स्थित है और दूसरे धुरे का चक्र मानसोत्तर पर्वत पर स्थित है. मानसोत्तर पर्वत क्या है इस पर्वत के पूर्व में इन्द्र की वस्वौकसारा स्थित है. इस पर्वत के पश्चिम में वरुण की संयमनी स्थित है. इस पर्वत के उत्तर में चंद्रमा की सुखा स्थित है. इस पर्वत के दक्षिण में यम की विभावरी स्थित है.

भगवान श्रीकृष्ण की माखनचोरी लीला

ब्रज घर-घर प्रगटी यह बात। दधि माखन चोरी करि लै हरि, ग्वाल सखा सँग खात।। ब्रज-बनिता यह सुनि मन हरषित, सदन हमारैं आवैं। माखन खात अचानक...